अधिकांश नेताओं और लोगों का दोहरा चरित्र: प्रमोद गिरि
इधर गांधीजी को महात्मा कहते हैं उधर गोडसे का करते हैं गुणगान
आगरा । गांधी का गुणगान करना राजनीति का एक बहुत बड़ा फैशन हो गया है। कुछ राजनीतिक पार्टियां गांधी के नाम /व्यक्तित्व का इस्तेमाल करते-करते सरकारों में पहुंच गई और कुछ ऐसी पार्टियां भी है जो अपने जन्म से ही गांधी को हृदय से नहीं मानती परंतु आज भी गांधी की मान्यताओं और उनकी कार्य पद्धति का गुणगान करती फिरती है, जबकि मूलतः उनका मन गोडसे का गुणगान करता है। "गांधी" वर्तमान समय में एक भी राजनीतिक पार्टी के लिए प्रासंगिक नहीं है क्योंकि गांधी हमेशा यह कहते थे कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साधन की शुद्धता या पवित्रता होना जरूरी है।
हालांकि इस पर उन्होंने अमल किया था, इस पर प्रश्न चिन्ह है, वह कहते थे कि यदि लक्ष्य अच्छा है तो उसे प्राप्त करने का रास्ता भी अच्छा होना चाहिए। किंतु ये उन्होंने खुद अपनाया हो इतिहास में ऐसा लगता तो नहीं है। उनके समय से लेकर आज तक जो मुझे समझ आता है वो इस समय में राजनीति हो, कार्पोरेट जगत हो या अन्य कोई क्षेत्र, वहां एक ही मानसिकता काम करती है "कैसे भी हो जीत पक्की होनी चाहिए।
आज सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टी सरकार में आने के लिए सब कुछ करना चाहती है, ये सभी पार्टीयां वर्तमान सरकारों को गिराने अथवा येन- केन- प्रकारेण सरकारों पर कब्जा करने के प्रयास में (अगर वो आदर्श थे) तो महात्मा गांधी के आदर्शों को भूलती जा रही है।
इन राजनीतिक पार्टियों में जो विपक्षी पार्टियों है वे सदैव महात्मा गांधी की हत्या के मामले में गोडसे का नाम बार-बार दोहराती है क्योंकि इस ऐसा करने पर उन्हें राजनीतिक लाभ प्राप्त होता है परंतु इंदिरा गांधी के हत्यारों, राजीव गांधी की हत्यारों इत्यादि इससे भी बड़े-बड़े जघन्य हत्याकांडों को याद भी नहीं करती। ऐसी स्थिति में ऐसा लगता है की सभी राजनीतिक पार्टियां गांधी को आज भी प्रासंगिक नहीं मानती है बल्कि वह केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए गांधी की आड़ में अपने आप को छुपाने का प्रयास करती रहती है।
जबकि मुझे ऐसा लगता है कि अगर गांधी जी देश के लिए अगर एक आदर्श थे तो उस समय प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल जी को होना चाहिए था, हिंदुस्तान, पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था तो फिर आज भी हिंदुस्तान में ये धर्म की लड़ाई क्यों? ऐसा मैने कहीं इतिहास में पढ़ा है कि गांधी जी के शरीर में तीन गोलियां निकली थी जबकि कांग्रेस हमेशा कहती रही है कि गोडसे ने उन्हें दो गोलियां मारी थी। आखिर सच्चाई क्या है, कांग्रेस संजय, राजीव, इन्दिरा जी की हत्याओं का जिक्र क्यों नहीं करती, केवल महात्मा गांधी पर ही राजनीति क्यों, आज़ादी के समय अगर पटेल साहब प्रधानमंत्री बन गए होते तो न धारा 370 लगती, न पी.ओ.के. चैप्टर होता, न कश्मीर चैप्टर होता, और चाइना से देश की सीमा का चैप्टर होता। कांग्रेस ने कभी भी देश हित में राजनीति नहीं की। उन्होंने हमेशा कुर्सी बचाने की राजनीति की। अब जब जनता को समझ आ रहा है कि देश हित में कैसी सरकार होनी चाहिए, तो विपक्षी पार्टियां कोई भी हथकंडा अपना कर (फिर चाहे वो विदेशी फंडिंग के द्वारा) ही क्यों न हो, कॉकरोच पार्टी के द्वारा वापस सत्ता में आना चाहते हैं। पर अब वो 1947 बाला हिंदुस्तान नहीं है। जय हिन्द, जय भारत
*-लेखक: प्रमोद गिरि (मंत्री), समाज सेवक एवं राजनीति विश्लेषक।*





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