-मोबाइल गेम की लत 'तामस प्रवृत्ति', बच्चों के विवेक व सोचने-समझने की शक्ति हो रही नष्ट: अमित मुनि महाराज
आगरा। हाल ही में एक समाचार पत्र के माध्यम से समाज को झकझोर देने वाली एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जहाँ एक संभ्रांत पॉश सोसायटी की तीन मासूम बालिकाओं ने आत्महत्या जैसा भयावह कदम उठा लिया। इस दर्दनाक घटना के पीछे जो कड़वा और चिंताजनक सच उभरकर आया, वह था मोबाइल गेम और डिजिटल दुनिया की जानलेवा लत। बताया गया कि परिजनों द्वारा बच्चों को समझाने के प्रयास किए गए, किंतु वर्चुअल वर्ल्ड के मायाजाल ने उनके कोमल जीवन को समय से पहले ही समाप्त कर दिया। यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। वर्धमान जैन भवन, सेक्टर-15 रोहिणी, नई दिल्ली में विराजित राष्ट्रसंत, उत्तर भारतीय प्रवर्तक सुभद्र मुनि जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित एक धर्मसभा में मुनिरत्न अमित मुनि जी महाराज ने नैतिक संस्कारों का अभाव विषय पर अपने संदेश में गहरी चिंता व्यक्त की। मुनिश्री ने कहा कि बच्चे किसी भी राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य होते हैं। उनके कोमल मन में प्रकृति ने अपार संभावनाएँ भरी होती हैं। जैसी संगति और वातावरण उन्हें मिलता है, वैसा ही उनका जीवन आकार लेता है।
उन्होंने मोबाइल गेम की लत को तामस प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि यह बच्चों के विवेक, संवेदनशीलता और सोचने-समझने की शक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज के बच्चे बुद्धिमान और प्रतिभाशाली होते हुए भी इस डिजिटल जाल में फँसते जा रहे हैं। उन्हें स्वयं यह चिंतन करना होगा कि उनके लिए क्या हितकारी है और क्या विनाशकारी।
मुनिश्री ने पूर्वकाल की पारिवारिक परंपराओं की चर्चा करते हुए कहा कि पहले बच्चे दादा-दादी और नाना-नानी के सान्निध्य में बैठकर जीवन का अनुभव, संस्कार और शिष्टाचार सहज रूप से सीख लेते थे। आज के न्यूक्लियर परिवार और अत्यधिक डिजिटल निर्भरता ने उस संवाद और स्नेह को समाप्त कर दिया है, जिसके अभाव में बच्चे आदर, सम्मान और मानवीय मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता की सीख में ही बच्चों का उज्ज्वल भविष्य निहित है, आवश्यकता केवल इतनी है कि बच्चे उनके पास बैठने और संवाद करने का समय निकालें। मानव जीवन अत्यंत अनमोल है और इसे केवल क्षणिक मनोरंजन या व्यर्थ प्रवृत्तियों में नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। मुनिश्री ने जोर देते हुए कहा कि यदि बच्चों को प्रारंभ से ही राष्ट्रभक्ति, नैतिक मूल्यों और ऐतिहासिक महान व्यक्तित्वों के आदर्शों से जोड़ा जाए, तो वे स्वयं को रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों में लगा सकेंगे। अपने संदेश के अंत में उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है स्मार्टफोन से अधिक स्मार्ट संस्कार की। जब तक हम बच्चों को अपनी जड़ों, बुजुर्गों के सान्निध्य और सही-गलत के मनोवैज्ञानिक बोध से नहीं जोड़ेंगे, तब तक ऐसी तामस प्रवृत्तियाँ हमारे भविष्य को लीलती रहेंगी।



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